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रिश्तों का व्यापार

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कदम रुक गए जब पहुंचे       हम रिश्तों के बाज़ार में... (यदि आप इसे  मोबाइल  पर देख रहे हैं तो कृपया बेहतर परिणामों के लिए अपनी ब्राउज़र सेटिंग्स को  डेस्कटॉप / कंप्यूटर मोड  में बदलें।)     कदम रुक गए जब पहुंचे       हम रिश्तों के बाज़ार में...  बिक रहे थे रिश्ते        खुले आम व्यापार में...  कांपते होठों से मैंने पूछा,        "क्या भाव है भाई        इन रिश्तों का...?"   दुकानदार बोला:   "कौन सा लोगे...?   बेटे का ... या बाप का...?   बहिन का... या भाई का...?  बोलो कौन सा चाहिए...?   इंसानियत का... या प्रेम का...?   माँ का... या विश्वास का...?   बाबूजी कुछ तो बोलो       कौन सा चाहिए  चुपचाप खड़े हो        कुछ बोलो तो सही...  मैंने डर कर पूछ लिया       "दोस्त का..."  दुकानदार नम आँखों से बोला  "संसार इसी रिश्ते       पर ही तो टिका है.....