Total Pageviews

Wednesday, November 28, 2012

आँधी - तूफ़ान का क्या, तुझको कोई खौफ नहीं ?

कैसे...???


इस तरह तूने मुझको, गले लगाया कैसे ?
तेरा काज़ल मेरे रुखसार पर आया कैसे ?
आँधी - तूफ़ान का क्या, तुझको कोई खौफ नहीं ?
मुझसे मिलने भरी बरसात में, आया कैसे ?






बात करना भी गवारा ना था मुझसे तुमको...
टेलीफोन पर गीत मुहब्बत का सुनाया कैसे ?
मोबाइल पर ही ले लिया मेरे जज़्बात का बोसा...
भींगती रात में ये जश्न, मनाया कैसे ?






जिन्दगी राग भी, ग़ज़ल भी, नगमा भी है "अल्फा"...
दिल के सरगम पर इसे तूने गाया कैसे ?
ये तो चंद पल की कहानी है यारों...
अपने जिन्दगी से मुझको अलग बसाया कैसे ?





_______________ भरत अल्फा 


नज़रें "अल्फा" की तुमको बहुत ढूँढती रही...

रात - बारात 




कल थी नशे में रात, मगर तुम वहाँ  ना थे ,
जज़्बात भी थे साथ, मगर तुम वहाँ  ना थे..।
पूनम का चाँद झील से उतरा था जिस घड़ी..!
करनी थी तुमसे बात, मगर तुम वहाँ  ना थे...।।




मंज़र था चाँदनी सराबोर हर तरफ ,
रंगीं  थी कायनात, मगर तुम वहाँ  ना थे..।
डोली मेरी उठी तो ज़नाज़े के रंग में ;
था गाँव सारा साथ, मगर तुम वहाँ  ना थे...।।




मधुशाला के आँगन में, नशे में था शराब ,
किस-किस को पिलाया मैंने, मगर तुम वहाँ  ना थे..।
नज़रें "अल्फा" की तुमको बहुत ढूँढती रही ;
आई  तो थी बारात, मगर तुम वहाँ  ना थे...।।

____________________________ अल्फा 

Thursday, November 8, 2012

मेरी ये ठाठ नवाबी कहूँ तो ..।।


                                      नवाबी दिल ...



किसी को कातिल , किसी को शराबी कहूँ तो ...
बुरा हूँ क्यूँ .? गर खराबी को खराबी कहूँ तो ..।।

बेशक़ दर्ज है यहाँ , उसकी बेबसी की दास्ताँ ...
जिन लफ्जों में लिखी , वो किताबी कहूँ तो ..।।


इस कदर बेताब , वो अब मुझसे मिलने को ...
कि उसकी तड़प को उसके , मैं बेताबी कहूँ तो ..।।


नज़रें मेहरबां  तो है , मगर देखूं कहाँ तक ..?
तेरी रौशनी में चाँद , या आफताबी कहूँ तो ..।।


रंग बदला सा लगता है , अब उस आसमां का ..
जिन रंगों में बदली , मैं उसे गुलाबी कहूँ तो ..।।


ख्वाहिशें मेरी , ये ना जाने कहाँ गुम  हो गयी है .?
उन ख्वाहिशों को गर , मैं  लाज़बाबी कहूँ तो ..।।


अब उसकी ..., इस मासूमियत पर क्या कहें "अल्फा" .?
की हुस्न का मिला , उसे ये खिताबी कहूँ तो ..।।



वही अदब , वही नज़ाक़त , भले ही चली गयी ...
मगर अब भी है , मेरी ये ठाठ नवाबी कहूँ तो ..।।

_______________________________ भरत अल्फा 

Sunday, June 17, 2012

राधा ऐसी भयी श्याम की दीवानी की ब्रिज की कहानी हो गयी।





                                            राधे-राधे 









राधा ऐसी भयी श्याम की दीवानी,
की ब्रिज की कहानी हो गयी।
एक भोली भाली  गाँव की गवारण ,
तो पंडितों की बानी हो गयी।



                                     


राधा ना होती,  तो  ब्रिन्दाबन भी, ब्रिन्दाबन ना होता,
कान्हा तो होते, बंसी  भी होती, बंसी में प्राण न होता।
प्रेम  की भाषा जानता ना कोई,  कन्हैया को योगी मानता ना कोई ,
बिना परिणय के वो प्रेम की पुजारन , कान्हा की पटरानी हो गयी।
राधा ऐसी भयी श्याम की दीवानी,
की ब्रिज की कहानी हो गयी।



             


राधा की पायल न बजती तो मोहन , ऐसी न रास रचाते,
निंदिया चुरा कर, मधुबन बुला कर, ऊँगली पे किसको नचाते।
क्या ऐसी खुशबू चन्दन में होती ?
क्या ऐसी मिश्री माखन में होती ?


        

थोड़ा सा माखन, खिला के वो ग्वालन ,
अन्नपूर्णा सी दानी हो गयी।
एक भोली भाली  गाँव की गवारण ,
तो पंडितों की बानी हो गयी।






राधा न होती तो कुञ्ज  भी, ऐसी निराली न होती.
राधा के नैना न रोते तो यमुना, ऐसी काली न होती।
सावन तो होता, झूले  न होते, राधा के संग नटवर झुले न होते,
सारा जीवन, लुटा के वो भिखारन , धनिकों की राजधानी हो गयी।

                 

एक भोली भाली  गाँव की गवारण,
तो पंडितों की बानी हो गयी।

राधा ऐसी भयी श्याम की दीवानी,
की ब्रिज की कहानी हो गयी।





Thursday, May 10, 2012

जय हिंद...!!!

10 मई , स्वतंत्रता संग्राम का पहला अध्याय, इसी दिन आज़ादी पहली बिगुल फूंकी गयी थी।
बड़ी संख्या में वैज्ञानिक तथा इंजिनियर देश को छोड़ कर पैसों  लालच में या अधिक पैसे कमाने के लिए  विदेश चले जाते हैं।  यह भी सही है की वहां उन्हें अधिक पैसा मिलता है, परन्तु  वही काम जो विदेश में करते हैं, अपने देश के लिए किया जाए। देश के प्रत्येक नागरिक के जुबां पर आप आ जायेंगे,
लेकिन क्या यही प्यार और  सम्मान विदेश में आपको मिलेगा.?
कभी नहीं .
प्यारे देशवाशियों, उनके  कुर्बानी को सार्थक बनाओ।
जय हिंद...!!!

Sunday, April 22, 2012

                                           प्यार का नशा


आती है बहारें गुलशन में , हर फूल मगर तब खिलता है,
करते हैं मुहब्बत सब ही मगर, हर दिल को सिला तब मिलता है...
दो प्यार भरे दिल रौशन हैं, वो रात बहुत अंधियारी है,
जब प्यार की राहों में आकर, दिल पे दिल ही वारी है...





जुल्फों  की बदलियों में, रातों में है नशा,
महबूब की अदा में, बातों में है नशा.
दिलदार की शराबी आँखों में है नशा,
होठों की सुर्ख़ियों में, साँसों में है नशा...



ना पूछ यार मुहब्बत का मज़ा कैसा है,
कोई दिन-रात ख़यालों में बसा रहता है...
बड़ी हसीन इसमें शाम ज़हर होती है,
ना दर्द-ओ-गम की ना-दुनियाँ की खबर होती है...



वो चुपके-चुपके आँखों से आँखें लड़ाना,
वो चुपके से पलकों पे आँसू सजाना...
वो चुपके से ख़्वाबों में दुल्हन बनाना,
वो चुपके से मस्ताना दिल में उतरना...



गुलाबी नर्म से होठों को चूम के देखो,
किसी की मद भरी बाँहों में झूम के देखो...
" अल्फा " ये प्यार का ऐसा शुरूर छाएगा,
तुझे जमीं पे भी जन्नत का मज़ा आएगा..... 



                                                                                           भरत कुमार